आज बहुत से विश्वासी, सेवकाई में लगे लोग, बाइबल पढ़ने वाले भाई-बहन, और परमेश्वर के वचन को गंभीरता से लेने वाले लोग एक ही प्रश्न पूछ रहे हैं: क्या हम अंत के समय में जी रहे हैं?
यह केवल जिज्ञासा का विषय नहीं है। यह आत्मिक जागृति का विषय है। जब हम संसार की घटनाओं को देखते हैं और साथ ही बाइबल की भविष्यवाणियों को पढ़ते हैं, तो हमारे भीतर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम उन दिनों के निकट पहुँच चुके हैं जिनकी चर्चा प्रभु यीशु मसीह ने की थी।
परंतु इस विषय को समझने के लिए हमें समाचारों से अधिक शास्त्रों की ओर देखना होगा। संसार अपनी राय देगा, लेकिन सच्चा प्रकाश केवल परमेश्वर का वचन देता है।
अंत के समय को समझने का सही आधार
बहुत लोग “अंत के समय” को केवल विनाश, न्याय, युद्ध या भय से जोड़ते हैं। लेकिन बाइबल में अंत का समय केवल संकट का समय नहीं, बल्कि परमेश्वर की योजना के पूर्ण होने का समय भी है।
यह वह समय है जब:
- भविष्यवाणियाँ पूरी होंगी
- कलीसिया की परीक्षा होगी
- बहुतों का विश्वास परखा जाएगा
- इस्राएल के विषय में परमेश्वर की योजना आगे बढ़ेगी
- और अंत में प्रभु यीशु की महिमा प्रकट होगी
इसलिए जब हम पूछते हैं क्या हम अंत के समय में जी रहे हैं, तो हमें भय से नहीं, विवेक और वचन के प्रकाश में उत्तर ढूँढना चाहिए।
1. प्रभु यीशु ने पहले ही चेतावनी दी थी
जब चेलों ने यीशु से पूछा कि आपके आने और युग के अंत का क्या चिन्ह होगा, तब प्रभु ने मत्ती 24 में उत्तर दिया।
यह बहुत महत्वपूर्ण है कि यीशु ने सबसे पहले युद्ध या भूकंप की नहीं, बल्कि धोखे की बात की।
“चौकस रहो! कोई तुम्हें न भरमाने पाए।” (मत्ती 24:4)
इससे हम सीखते हैं कि अंत के समय का सबसे बड़ा खतरा बाहरी संकट नहीं, बल्कि आत्मिक धोखा है।
आज बहुत लोग नाम से मसीही हैं, पर सत्य में स्थिर नहीं। बहुत से लोग शिक्षा सुनते हैं, पर वचन नहीं परखते। इसलिए यदि हम पूछते हैं क्या हम अंत के समय में जी रहे हैं, तो पहला संकेत है कि सत्य और असत्य के बीच संघर्ष बढ़ेगा।
2. प्रेम का ठंडा पड़ना केवल सामाजिक नहीं, आत्मिक संकेत है
“अधर्म के बढ़ने से बहुत लोगों का प्रेम ठंडा हो जाएगा।” (मत्ती 24:12)
यहाँ प्रभु संसार के लोगों की नहीं, बहुतों की बात करते हैं जो विश्वास के वातावरण में थे।
आज कई स्थानों पर आराधना है, गतिविधि है, सभाएँ हैं, परंतु हृदय में पहली जैसी आग नहीं है। प्रार्थना औपचारिक हो गई है। वचन पढ़ना कम हो गया है। पाप के प्रति संवेदनशीलता घट गई है।
यह केवल नैतिक गिरावट नहीं, आत्मिक शिथिलता है।
जब विश्वासी बाहरी रूप रखते हैं, पर भीतर का प्रेम ठंडा पड़ जाए, तो यह अंत के समय का गंभीर संकेत है।
3. झूठे शिक्षक और आत्मिक भ्रम
“बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे और बहुतों को भरमाएँगे।” (मत्ती 24:11)
आज इस वचन की गंभीरता पहले से अधिक दिखाई देती है। बहुत से लोग वचन से अधिक अनुभवों के पीछे भागते हैं। कुछ लोग पश्चाताप के बिना आशीष चाहते हैं। कुछ लोग क्रूस के बिना महिमा चाहते हैं।
जहाँ मसीह का सच्चा सुसमाचार होना चाहिए, वहाँ कई बार मनुष्य-केंद्रित संदेश सुनाई देता है।
इसलिए आज हर विश्वासी को प्रेरितों के काम 17:11 के बेरिया वालों जैसा होना चाहिए, जो प्रतिदिन शास्त्रों में जाँचते थे कि बातें सत्य हैं या नहीं।
यदि कोई विश्वासी यह पूछता है क्या हम अंत के समय में जी रहे हैं, तो उसे यह भी पूछना चाहिए: क्या मैं सत्य में स्थिर हूँ?

4. कलीसिया की जागृति और सुसमाचार का प्रचार
“राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा…” (मत्ती 24:14)
यह अंत के समय का भयावह नहीं, आशावान संकेत है।
आज अनेक भाषाओं में बाइबल उपलब्ध है। ऑनलाइन सेवकाई, प्रचार, शिक्षाएँ, मिशन कार्य, गवाही, और डिजिटल माध्यमों से परमेश्वर का वचन उन स्थानों तक पहुँच रहा है जहाँ पहले पहुँचना कठिन था।
परमेश्वर अंत से पहले गवाही दे रहा है।
यह समय सोने का नहीं, खेत में काम करने का समय है।
जो विश्वासी समझदार है, वह इन दिनों को (क्या हम अंत के समय में जी रहे हैं,) केवल संकट का समय नहीं, बल्कि कटनी का समय समझेगा।
5. परीक्षा का समय और विश्वास की छंटनी
बाइबल बार-बार बताती है कि अंत के दिनों में विश्वास की परीक्षा होगी।
“पर जो अंत तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा।” (मत्ती 24:13)
यह वचन बताता है कि केवल शुरुआत करना पर्याप्त नहीं, अंत तक स्थिर रहना आवश्यक है।
आज बहुत लोग जल्दी उत्साहित होते हैं, पर जल्दी ठंडे भी पड़ जाते हैं। कुछ लोग सुविधा तक चलते हैं, पर कठिनाई आते ही पीछे हट जाते हैं।
अंत के समय में परमेश्वर सच्चे और सतही विश्वास के बीच अंतर प्रकट करेगा।
6. क्या दिन और घड़ी जानना संभव है?
स्पष्ट उत्तर है, नहीं।
“उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता…” (मत्ती 24:36)
इसलिए जो लोग तारीखें बताते हैं, वे शास्त्र से बाहर जाते हैं।
परंतु प्रभु ने यह भी कहा कि अंजीर के वृक्ष से सीखो। अर्थात संकेतों को पहचानो। हमें समय तय नहीं करना, पर जागते रहना है।
मसीही जीवन भविष्यवाणी गिनने का नहीं, तैयारी में जीने का जीवन है।
यह भी पढ़ें – जीवन की समस्या से छुटकारा
7. विश्वासियों को अब क्या करना चाहिए?
यदि सच में हम पूछ रहे हैं क्या हम अंत के समय में जी रहे हैं, तो उत्तर जानने से अधिक ज़रूरी है तैयारी करना।
वचन में गहरे जाओ
केवल प्रेरणादायक बातें नहीं, शास्त्र का ठोस ज्ञान लो।
प्रार्थना में बने रहो
अंत के दिनों में बिना प्रार्थना के स्थिर रहना कठिन होगा।
पवित्रता में चलो
दुनिया से समझौता करने वाला विश्वास लंबे समय तक टिकता नहीं।
संगति में बने रहो
कलीसिया से कटकर चलना खतरनाक है।
सुसमाचार बाँटो
समय कम है, खेत तैयार है।
8. क्या हमें डरना चाहिए?
यदि कोई व्यक्ति प्रभु से दूर है, तो उसे पश्चाताप करना चाहिए। यदि कोई विश्वासी उदासीन हो गया है, तो उसे जागना चाहिए।
पर जो प्रभु में हैं, उनके लिए यह डर का नहीं, आशा का समय है।
“जब ये बातें होने लगें, तो सीधे होकर सिर उठाना, क्योंकि तुम्हारा छुटकारा निकट होगा।” (लूका 21:28)
अंत के समय की चर्चा विश्वासियों के लिए भय नहीं, प्रत्याशा की बात है।
निष्कर्ष
तो, क्या हम अंत के समय में जी रहे हैं?
बाईबल के प्रकाश में देखें, तो बहुत से संकेत हमारे सामने हैं। धोखा बढ़ रहा है, प्रेम ठंडा पड़ रहा है, सुसमाचार फैल रहा है, और विश्वास की परीक्षा हो रही है।
हम दिन और घड़ी नहीं जानते, पर समय की गंभीरता अवश्य पहचान सकते हैं।
इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि प्रभु कब आएँगे। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब वे आएँगे, तब क्या हम विश्वासयोग्य पाए जाएँगे?
आइए जागते रहें, वचन में स्थिर रहें, पवित्रता में चलें, और उस धन्य आशा की बाट जोहें, जब हमारा प्रभु यीशु मसीह प्रकट होगा।

